हर अंग एक कर्म, हर कर्म में ईश्वर
1. ईश्वर की सृष्टि की अद्भुत रचना ईश्वर की सृष्टि अत्यंत सुव्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण है।मानव शरीर का प्रत्येक अंग किसी विशेष कार्य के लिए …
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1. ईश्वर की सृष्टि की अद्भुत रचना ईश्वर की सृष्टि अत्यंत सुव्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण है।मानव शरीर का प्रत्येक अंग किसी विशेष कार्य के लिए …
1. कर्म ही जीवन का वास्तविक मूल्य है मनुष्य का जीवन केवल श्वास लेने के लिए नहीं, बल्कि कर्म करने के लिए है।जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों का निर…
1. जीवन का प्रथम कर्तव्य जीवन का आरंभ माँ के स्तनपान से होता है।यह केवल पोषण नहीं, बल्कि जीवन को स्वीकार करने की प्रक्रिया है।शिशु का स्तनप…
1. प्रेम एवं भक्ति का दिव्य स्वरूप प्रेम और भक्ति वह पवित्र मार्ग हैं जो भक्त के हृदय को ईश्वर से जोड़ते हैं।जब प्रेम निष्कलुष होता है और भ…
1. समय और प्रभु की एकता समय की शक्ति के समान ही प्रभु की शक्ति अनंत है।समय चलता है क्योंकि प्रभु की इच्छा कार्यरत है।जो जन्म देता है, बढ़ात…
1) अवतारों का अनंत रहस्य युग-युग में प्रभु के अवतार होते रहे हैं और होते रहेंगे।उनके कर्मों की सीमा मनुष्य की समझ से परे है।कौन कब आएगा, कब…
1. सृजन और चेतना के आधार प्रभु चेतन और अचेतन दोनों को जीवन देने वाले प्रभु सर्वशक्तिमान हैं।उनकी शक्ति से ही निर्जीव में भी गति और चेतना का…
1. सृजनकर्ता ईश्वर ईश्वर ही इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के सृजनकर्ता हैं।जड़ और चेतन, दृश्य और अदृश्य—सब उन्हीं की रचना है।सूर्य, चंद्र, पृथ्वी औ…