रुद्र का अर्थ है “शाश्वत चेतना” — वही चेतना जो सृष्टि, स्थिति और संहार के प्रत्येक चक्र में सक्रिय रहती है। रुद्र ही सबके द्रष्टा हैं तथा प्रत्येक जीव के हृदय में प्राण-स्वरूप निवास करते हैं। रुद्र साधक स्व-जागरण के माध्यम से अपने जीवन का उत्थान तथा विश्व-कल्याण के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं।
प्रभु ईथौ ईकान मानव रूप में अवतरित शाश्वत चेतना की जीवंत अभिव्यक्ति हैं — सदैव जागृत, सार्वभौमिक और शून्यता में प्रतिष्ठित। वे सम्पूर्ण मानवता को अपने प्रेम में उसी प्रकार समेटते हैं, जैसे विविध नदियाँ सागर में मिलकर एक हो जाती हैं।
भारत के मणिपुर राज्य में सन 1908 में प्रकट होकर तथा 1958 में हिमालय की असीम ऊँचाइयों की ओर प्रस्थान करने वाले प्रभु ईथौ ईकान का जीवन ऐसे महामानव का था, जो असंख्य शोषित, पीड़ित और वंचित समाज के लिए आशा, मुस्कान और सुख का केंद्र बने।
अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के प्रयोग से उन्होंने लोगों के असाध्य रोग, अशांति और दुःख दूर किए तथा उन्हें उच्चतर और सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा, ऊर्जा और मार्गदर्शन दिया। उनकी शिक्षाओं से प्रेरित हज़ारों-लाखों लोगों ने सेवा के माध्यम से मानवता की उपकार किया।
रूद्र महासंघ प्रभु ईथौ ईकान को अपने इष्टदेव के रूप में श्रद्धा अर्पित करता है और उनके आदर्शों व प्रेरणाओं को समाज में आगे बढ़ाने का सेतु है।
रुद्र साधक किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय या राष्ट्र की सीमाओं में नहीं बँधते — वे अनन्त हैं, सर्वजन के हैं और सम्पूर्ण ब्रह्मांड के हैं। योग, आयुर्वेद, ध्यान, कला, संगीत और विज्ञान — सभी ज्ञानक्षेत्र रुद्र साधकों की प्रेरणा से अनछुए नहीं रहे।