1️⃣ अहंकार – विवेक का नाश
जब मनुष्य के भीतर अहंकार बढ़ जाता है, तब उसका विवेक धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। वह स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानने लगता है और दूसरों की बातों, सलाहों तथा अनुभवों को महत्व नहीं देता। इस कारण उसके निर्णय संतुलित नहीं रहते और वह गलत दिशा में बढ़ने लगता है।
2️⃣ परम्पराओं और मूल्यों की अवहेलना
अहंकारी व्यक्ति अपने अहं के कारण समाज की परम्पराओं और आदर्शों को तोड़ देता है। उसे यह लगता है कि वही सही है और बाकी सब गलत हैं। इस सोच के कारण वह जीवन के उन मूल्यों से दूर हो जाता है जो मनुष्य को सच्चा और महान बनाते हैं।
3️⃣ कथनी और करनी में अंतर
अहंकार मनुष्य को ऐसा बना देता है कि उसकी कथनी और करनी में अंतर आ जाता है। वह बड़ी-बड़ी बातें तो करता है, परंतु अपने आचरण में उनका पालन नहीं करता। धीरे-धीरे लोग उसकी बातों पर विश्वास करना भी छोड़ देते हैं।
4️⃣ जीवन का मूल्यहीन हो जाना
जब मनुष्य अहंकार के प्रभाव में आ जाता है, तब उसके जीवन से विनम्रता, सद्भाव और कृतज्ञता जैसे गुण समाप्त होने लगते हैं। परिणामस्वरूप उसका जीवन मूल्यहीन बन जाता है और समाज में उसका सम्मान भी कम हो जाता है।
5️⃣ कर्मों का गलत दिशा में जाना
अहं की भावना जीवन के हर क्षेत्र में मनुष्य के कर्मों को प्रभावित करती है। वह अपने निर्णयों में संतुलन खो देता है और कई बार ऐसे कार्य कर बैठता है जो उचित नहीं होते। अंततः उसके कर्म सफल होने के बजाय असफल हो जाते हैं।