सांसारिक चक्र और ईश्वरीय चेतना
सर्दी और गर्मी का आवर्तन, अंधकार और प्रकाश का क्रमिक परिवर्तन, दिन–रात का चक्र, महीनों और वर्षों का निरंतर प्रवाह—ये सभी हमें जीवन की उस दिव्य व्यवस्था का बोध कराते हैं, जो ईश्वर द्वारा संचालित है। यह संसार केवल संयोग से नहीं चल रहा, बल्कि एक सुनिश्चित नियम, लय और संतुलन के अंतर्गत निरंतर गतिमान है। यही लय इस संसार को स्थायित्व प्रदान करती है और यही संतुलन इसके शाश्वत स्वरूप को उजागर करता है।
प्रकृति के ये चक्र हमें यह सिखाते हैं कि परिवर्तन जीवन का अनिवार्य सत्य है। कोई भी अवस्था स्थायी नहीं है। जिस प्रकार शीत ऋतु के पश्चात ग्रीष्म का आगमन निश्चित है और अंधकार के बाद प्रकाश अवश्य प्रकट होता है, उसी प्रकार जीवन में सुख और दुःख, सफलता और असफलता, उत्थान और पतन आते-जाते रहते हैं। परंतु इन सभी परिवर्तनों के बीच जो निरंतर बना रहता है, वह है—चक्र का प्रवाह।
दिन और रात का चक्र हमें कर्म और विश्राम का संतुलन सिखाता है। दिन कर्म का प्रतीक है, जहाँ मनुष्य अपनी चेतना को बाह्य जगत में लगाता है, जबकि रात आत्मविश्राम, अंतर्मुखता और अचेतन की गहराइयों में प्रवेश का संकेत देती है। इसी प्रकार महीनों और वर्षों का चक्र हमें धैर्य, प्रतीक्षा और समय के महत्व का बोध कराता है। समय कभी रुकता नहीं, वह केवल रूप बदलता हुआ आगे बढ़ता रहता है।
इसी प्राकृतिक क्रम के समान चेतन और अचेतन का चक्र भी अंतहीन है। चेतन अवस्था में मनुष्य सोचता है, निर्णय लेता है और कर्म करता है। वहीं अचेतन अवस्था में उसके संस्कार, स्मृतियाँ और अनुभूतियाँ संचित होती रहती हैं। यह दोनों अवस्थाएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। चेतन बिना अचेतन के अधूरा है और अचेतन बिना चेतन के दिशाहीन।
जब मनुष्य इस सत्य को समझ लेता है कि जीवन केवल जागृत अवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि अचेतन की गहराइयों में भी उसका विस्तार है, तब वह स्वयं को अधिक व्यापक रूप में अनुभव करने लगता है। यही अनुभव उसे आत्मचिंतन, साधना और अंततः आत्मबोध की ओर ले जाता है।
इन सभी चक्रों का समन्वय हमें यह अनुभूति कराता है कि ईश्वर द्वारा प्रदत्त यह सांसारिक व्यवस्था अंतहीन है। आरंभ और अंत वास्तव में हमारी सीमित दृष्टि के परिणाम हैं। सत्य यह है कि सृष्टि निरंतर सृजन, संरक्षण और परिवर्तन की प्रक्रिया में लगी हुई है। चेतना रूप बदलती है, पर नष्ट नहीं होती; प्रकृति परिवर्तित होती है, पर समाप्त नहीं होती।
यह अंतहीनता हमें भय नहीं, बल्कि आश्वासन देती है—कि जीवन व्यर्थ नहीं है, हर अनुभव किसी न किसी उच्च उद्देश्य की ओर ले जाता है। जब मनुष्य इस चक्र को स्वीकार कर लेता है, तब उसके भीतर संघर्ष कम और समर्पण अधिक हो जाता है।
निष्कर्ष:
सर्दी–गर्मी, अंधकार–प्रकाश, दिन–महीना–वर्ष तथा चेतन–अचेतन के चक्र हमें परिवर्तन, संतुलन और अनंतता का गहन बोध कराते हैं। इन्हें समझकर मनुष्य जीवन को अधिक धैर्य, विवेक और ईश्वर-भाव के साथ जी सकता है। यही समझ जीवन को साधारण से आध्यात्मिक बना देती है।