1. ईश्वर का सर्वव्यापक स्वरूप
संसार में जो कुछ भी दृश्यमान है—पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, जीव-जंतु और मनुष्य—सब ईश्वर के ही विविध रूप हैं।
ईश्वर किसी एक स्थान या आकृति तक सीमित नहीं है।
उनकी चेतना कण-कण में व्याप्त है।
जिस प्रकार सागर की प्रत्येक बूंद में सागर समाया होता है, उसी प्रकार प्रत्येक वस्तु में ईश्वर का अंश विद्यमान है।
2. सृष्टि में ईश्वर की रचनात्मक शक्ति
हर वस्तु का निर्माण ईश्वर की सृजन शक्ति से हुआ है।
प्रकृति की व्यवस्था, ऋतुओं का क्रम और जीवन का संतुलन स्वयं ईश्वरीय योजना का प्रमाण है।
कोई भी वस्तु स्वतः नहीं बनी, उसके पीछे एक दिव्य शक्ति कार्यरत है।
यह सृष्टि ईश्वर की कला और करुणा का जीवंत उदाहरण है।
3. प्रत्येक अस्तित्व में ईश्वर का अस्तित्व
जो भी जीव या वस्तु अस्तित्व में है, उसके भीतर ईश्वर की उपस्थिति है।
जीवन की चेतना ईश्वर से ही प्राप्त होती है।
शरीर नश्वर है, परंतु उसमें स्थित आत्मा ईश्वरीय अंश है।
इसलिए प्रत्येक प्राणी आदर और करुणा का पात्र है।
4. सभी में निहित ईश्वर का बोध
जब हम प्रत्येक में ईश्वर को देखने लगते हैं, तब द्वेष और अहंकार समाप्त होने लगते हैं।
यह दृष्टि मानव को प्रेम, सहिष्णुता और सेवा की ओर ले जाती है।
सभी भेद केवल बाहरी हैं, भीतर एक ही दिव्य तत्व विद्यमान है।
यही बोध सच्चे धर्म और मानवता की नींव है।
5. ईश्वर में समाहित संपूर्ण सृष्टि
जैसे आकाश में सब कुछ समाया हुआ है, वैसे ही ईश्वर में संपूर्ण सृष्टि समाहित है।
सृष्टि ईश्वर से उत्पन्न होती है, उसी में स्थित रहती है और अंततः उसी में विलीन हो जाती है।
ईश्वर आधार भी है और लक्ष्य भी।
इस सत्य को जान लेना ही आत्मज्ञान और मोक्ष का मार्ग है।