1. परिवर्तन प्रकृति का नियम
जिस प्रकार समय आने पर साँप अपनी पुरानी केंचुली त्यागकर नया रूप धारण करता है, उसी प्रकार इस संसार में परिवर्तन सतत चलता रहता है। हर जीव, हर तत्व निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजरता है। यह प्रकृति का शाश्वत और अटल नियम है।
2. मानव जीवन में देह-परिवर्तन की प्रक्रिया
मनुष्य भी समय आने पर अपने पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करता है। शरीर नश्वर है — यह जन्म लेता है, बढ़ता है और अंततः समाप्त होता है। परंतु जीवन का मूल तत्व, चेतना या प्राण अपनी यात्रा आगे बढ़ाते हुए नया शरीर ग्रहण कर लेता है।
3. शरीर से पृथक प्राण का अस्तित्व
जैसे साँप केवल केंचुली छोड़ता है, अपना अस्तित्व नहीं;
उसी तरह मनुष्य का प्राण शरीर से अलग होता है। शरीर भौतिक तत्वों से बना है, जबकि प्राण सूक्ष्म, चेतन और अविनाशी है। शरीर बदल सकता है, पर प्राण अपनी शक्ति, पहचान और यात्रा को आगे बढ़ाता रहता है।
4. देह नहीं, प्राण है वास्तविक शक्ति
मनुष्य का वास्तविक आधार उसका शरीर नहीं, बल्कि प्राणतत्व है।
शरीर बिना प्राण के केवल मिट्टी का ढेर है, पर प्राण के साथ वही शरीर चेतन, कर्मशील और सक्रिय बन जाता है। इसलिए जीवन का सार प्राण में है, शरीर में नहीं।