1. परमात्मा की सर्वव्यापकता
परमात्मा सर्वव्यापी हैं, अर्थात वे प्रत्येक जीव, प्रत्येक अणु और सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं। उनका अस्तित्व हर जगह है — दिखाई दे या न दे, वे प्रत्येक हृदय में विद्यमान रहते हैं। जैसे आकाश सबको अपने में समेटे हुए है, वैसे ही परमात्मा भी सबमें समाए हुए हैं।
2. प्राण की उपस्थिति
जिस प्रकार परमात्मा सर्वत्र व्याप्त हैं, उसी प्रकार प्राण भी सर्वव्यापक है। प्राण मन, बुद्धि और विचार के बीच प्रवाहित होकर जीवन को संचालित करता है। यह वही जीवन ऊर्जा (Life Force) है जो हमें सोचने, बोलने और कार्य करने की शक्ति देती है। जब तक प्राण शरीर में है, तब तक जीवन है; प्राण के बिना सब शून्य हो जाता है।
3. प्राण और परमात्मा का संबंध
प्राणतत्त्व वास्तव में परमात्मा का ही दूसरा रूप है। जैसे एक ही सूर्य से अनेक किरणें निकलती हैं, वैसे ही परमात्मा से निकलने वाली चेतना ही प्राण के रूप में हर जीव में विद्यमान है। जब हम अपने प्राण को शुद्ध और संतुलित करते हैं, तो हम अपने भीतर स्थित परमात्मा के स्वरूप का अनुभव कर सकते हैं। इस प्रकार प्राण और परमात्मा में कोई भेद नहीं है; दोनों एक ही चैतन्य शक्ति के दो रूप हैं — एक अनंत और दूसरा जीवन का आधार।