जब मन अशांत होता है —
तो व्यक्ति क्रोध, भय, ईर्ष्या, और असुरक्षा से घिर जाता है।
ऐसे में चाहे वह कितनी भी बाहरी धार्मिक क्रियाएँ करे,
वह सच्चे धर्म का अनुभव नहीं कर सकता।
लेकिन जब मन शांत होता है,
तो उसी शांति में प्रेम, सत्य, और करुणा स्वाभाविक रूप से प्रकट होते हैं।
यही वह स्थिति है जहाँ धर्म जीवंत होता है —
न कि केवल शब्दों या अनुष्ठानों में, बल्कि जीवन में।
सार:
धर्म का उद्देश्य बाहरी प्रदर्शन नहीं,
बल्कि भीतर की यात्रा है —
जहाँ मन शांत हो, हृदय निर्मल हो, और आत्मा का स्पर्श अनुभव हो।
जब व्यक्ति अपने भीतर शांति पाता है,
वह स्वाभाविक रूप से दूसरों के प्रति दयालु, सहनशील और प्रेमपूर्ण बन जाता है।
और यही सच्चा धर्म है —
जो आंतरिक शांति से शुरू होकर सार्वभौमिक प्रेम में बदल जाता है।